लखनऊ। ऐशबाग के ऐतिहासिक श्रीरामलीला मैदान में आयोजित ‘रामोत्सव 2026’ के तीसरे दिन श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों से लेकर कैकेयी के दो वरदान, श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास और माता सीता व लक्ष्मण के उनके साथ वन गमन तक की मार्मिक लीलाओं का मंचन किया गया। कभी उत्सव और उल्लास तो कभी विरह और वेदना से भरे दृश्यों ने दर्शकों को भावुक कर दिया। कलाकारों ने अपने प्रभावशाली अभिनय से अयोध्या के राजमहल में घटित घटनाओं को मंच पर जीवंत कर दिया।

रामलीला के आरंभ में श्रीराम और उनके चारों भाइयों के विवाह के बाद बारात की अयोध्या वापसी तथा नववधुओं के स्वागत के प्रसंग का मंचन हुआ। अयोध्या में खुशियों का माहौल दिखाई दिया। नगरवासी नाचते-गाते हुए राजपरिवार के आगमन का उत्सव मनाते नजर आए। विवाह के बाद अयोध्या में सुख और उल्लास का वातावरण था, लेकिन जल्द ही कथा ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरे राजपरिवार को गहरे संकट में डाल दिया।
कथा के अनुसार, राजकुमार भरत अपने भाई शत्रुघ्न के साथ ननिहाल चले जाते हैं। इसी बीच महाराजा दशरथ अपने मंत्रिमंडल के साथ उत्तराधिकारी को लेकर विचार-विमर्श करते हैं। सभी की सहमति से श्रीराम को अयोध्या का अगला राजा बनाने और उनके राज्याभिषेक की घोषणा की जाती है। जैसे ही राज्याभिषेक की खबर नगर में फैलती है, अयोध्या में उत्सव का माहौल बन जाता है। मंच पर प्रस्तुत इन दृश्यों में नागरिकों की प्रसन्नता और राजपरिवार के उत्साह को खूबसूरती से दर्शाया गया।

राज्याभिषेक से पहले महाराजा दशरथ श्रीराम को राजा के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का ज्ञान देते हैं। दूसरी ओर, तीनों रानियां भी श्रीराम के राजतिलक की खबर से प्रसन्न दिखाई देती हैं। सब कुछ अनुकूल नजर आ रहा होता है, लेकिन तभी मंथरा के बहकावे में आकर कैकेयी महाराजा दशरथ से पूर्व में दिए गए दो वरदान मांग लेती हैं।
कैकेयी के पहले वरदान के अनुसार भरत को अयोध्या का राजसिंहासन दिया जाना था, जबकि दूसरे वरदान में श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगा जाता है। कैकेयी की मांग सुनकर महाराजा दशरथ गहरे संकट में पड़ जाते हैं। एक ओर पुत्र श्रीराम के प्रति उनका स्नेह है, तो दूसरी ओर अपने वचन की मर्यादा निभाने का धर्म। विवश राजा दशरथ अपने वचन से पीछे नहीं हट पाते और राजमहल में दुख की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
जब श्रीराम को वनवास की जानकारी मिलती है, तो वे किसी प्रकार का विरोध किए बिना माता कैकेयी की आज्ञा और पिता के वचन का सम्मान करते हुए वन जाने के लिए सहर्ष तैयार हो जाते हैं। श्रीराम का यह निर्णय उनके त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और मर्यादा को दर्शाता है। माता सीता भी पति के साथ वन जाने का निश्चय करती हैं, वहीं भाई लक्ष्मण भी श्रीराम का साथ निभाने के लिए वन गमन के लिए तैयार हो जाते हैं।
श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वन जाने की खबर अयोध्यावासियों तक पहुंचती है तो नगर में शोक और आक्रोश का वातावरण छा जाता है। अपने प्रिय राजकुमार को वनवास दिए जाने से दुखी नागरिक इस फैसले का विरोध करते दिखाई देते हैं। मंच पर अयोध्यावासियों की व्यथा और राजमहल के भीतर बढ़ते संकट को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।
रामलीला का सबसे भावुक प्रसंग उस समय सामने आया, जब महाराजा दशरथ अपने प्रिय पुत्र के वन जाने के दुख में व्याकुल नजर आए। महारानी कौशल्या पुत्र वियोग से टूट जाती हैं, जबकि रानी सुमित्रा का भी रो-रोकर बुरा हाल हो जाता है। राजमहल का वातावरण शोक में डूब जाता है। जिन गलियारों में कुछ समय पहले राज्याभिषेक की तैयारियों को लेकर खुशियां थीं, वहीं अब विरह और पीड़ा का माहौल दिखाई देता है।
कलाकारों ने संवाद, भाव-भंगिमाओं और अभिनय के माध्यम से इन प्रसंगों को मंच पर प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया। रामोत्सव में आए दर्शकों ने श्रीराम के वन गमन और राजपरिवार के दुख से जुड़े दृश्यों को भावुक होकर देखा। रामलीला ने एक बार फिर मर्यादा, त्याग, पारिवारिक संबंधों और वचन पालन के आदर्शों को दर्शकों के सामने रखा।

बुधवार को रामोत्सव 2026 के मंच पर स्थानीय कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां दीं। नेहा डांस एकेडमी और ऋचा तिवारी के निर्देशन में प्रस्तुत कार्यक्रमों ने आयोजन में सांस्कृतिक रंग भरे।
श्रीरामलीला समिति ऐशबाग के अध्यक्ष हरीशचन्द्र अग्रवाल ने बताया कि बुधवार को श्रीराम के वन गमन, निषादराज और केवट मिलन संवाद, आर्य सुमंत की वापसी, श्रीराम और महर्षि वाल्मीकि संवाद, श्रवण कुमार की कथा, पुत्र वियोग में राजा दशरथ के स्वर्ग गमन, कैकेयी-भरत संवाद तथा कैकेयी परित्याग जैसी लीलाओं का मंचन किया जाएगा।
ऐशबाग का ऐतिहासिक रामलीला आयोजन धार्मिक आस्था के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और रामकथा के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम बना हुआ है। रामोत्सव 2026 में प्रस्तुत लीलाओं के जरिए दर्शकों को श्रीराम के त्याग, लक्ष्मण की भ्रातृभक्ति, सीता के समर्पण और महाराजा दशरथ के पुत्र प्रेम जैसे प्रसंगों से रूबरू होने का अवसर मिल रहा है।





