लखनऊ, 13 अक्टूबर 2026। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ में योग की भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समग्र कल्याण में इसकी भूमिका पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। एमीनेंट लेक्चर सीरीज समिति की ओर से आयोजित इस व्याख्यान का विषय ‘योग: भारतीय ज्ञान परंपरा से आधुनिक वैज्ञानिक समझ और समग्र कल्याण तक’ रहा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. एच.आर. नागेंद्र उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की।
व्याख्यान में योग को केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि शरीर, मन और चेतना के बीच संतुलन स्थापित करने वाली समग्र जीवन पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया गया। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में बढ़ते तनाव, तेजी से बदलती जीवनशैली और प्रतिस्पर्धा के बीच योग व्यक्ति को शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्थिरता, भावनात्मक संतुलन और आत्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकता है।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके बाद विश्वविद्यालय का कुलगीत प्रस्तुत किया गया। आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथि को पौधा भेंट कर स्वागत किया गया। एमीनेंट लेक्चर सीरीज समिति की चेयरपर्सन प्रो. शिल्पी वर्मा ने उपस्थित अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए व्याख्यान के उद्देश्य एवं रूपरेखा की जानकारी दी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुदर्शन चक्रधारी ने किया।
योग भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों का अभिन्न अंग: कुलपति
कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा और योग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योग भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अभिन्न अंग है। यह व्यक्ति को आत्मचिंतन, आत्मबोध और समाज कल्याण की भावना से जोड़ता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा में योग का अर्थ केवल आसन और शारीरिक अभ्यास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का माध्यम है।
प्रो. मित्तल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा व्यक्ति को आंतरिक शांति, नैतिक मूल्यों और सामूहिक कल्याण की प्रेरणा देती है। आधुनिक जीवन में भौतिक उपलब्धियों और प्रतिस्पर्धा पर बढ़ते जोर के बीच आत्मिक संतुलन और मानवीय मूल्यों को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने युवाओं से अपनी सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान और योग की प्राचीन परंपरा से जुड़ने का आह्वान किया।
कुलपति ने कहा कि आधुनिकता और तीव्र प्रगति की दौड़ में युवाओं को अपने नैतिक एवं मानवीय मूल्यों से समझौता नहीं करना चाहिए। योग अनुशासन, संयम, सहिष्णुता और समरसता का मार्ग दिखाता है। ये गुण न केवल संतुलित व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक हैं, बल्कि स्वस्थ और सामंजस्यपूर्ण समाज के विकास के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने कहा कि योग के सिद्धांतों को दैनिक जीवन में अपनाकर युवा अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो सकते हैं। इसके साथ ही सामाजिक सद्भाव, मानवीय संवेदनाओं और विश्व कल्याण की भावना को भी मजबूत किया जा सकता है।

योग मानव जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम: पद्मश्री डॉ. एच.आर. नागेंद्र
मुख्य अतिथि एवं वक्ता पद्मश्री डॉ. एच.आर. नागेंद्र ने योग की व्यापक उपयोगिता पर चर्चा करते हुए कहा कि योग एक क्रांति के समान है, जिसमें मानव जीवन में सकारात्मक और व्यापक परिवर्तन लाने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक समाज में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच योग का महत्व और अधिक बढ़ गया है। योग व्यक्ति के बाहरी व्यक्तित्व के साथ-साथ उसके आंतरिक जीवन में भी बदलाव लाने का माध्यम बन सकता है।
उन्होंने बताया कि योग के बाहरी प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य, क्षमता और कार्यशैली में दिखाई दे सकते हैं, जबकि इसके आंतरिक आयाम मानसिक स्थिति, भावनात्मक संतुलन, अंतःचेतना और आत्मिक विकास से जुड़े हैं। इस दृष्टि से योग व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया है।
पंचकोश सिद्धांत से समझाया समग्र व्यक्तित्व विकास
डॉ. नागेंद्र ने भारतीय ज्ञान परंपरा में वर्णित पंचकोश की अवधारणा की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश के महत्व को समझाते हुए कहा कि इन सभी आयामों के समुचित विकास से व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व को निखारने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि योग को केवल शारीरिक व्यायाम मानना इसकी व्यापक अवधारणा को सीमित करना होगा। योग शरीर, मन और चेतना के बीच संतुलन स्थापित करने वाली जीवन पद्धति है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति के विभिन्न आयामों का समन्वित विकास करना है।

अष्टांग योग के नियमित अभ्यास पर दिया जोर
व्याख्यान के दौरान डॉ. नागेंद्र ने अष्टांग योग के आठ अंगों—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन अंगों का नियमित अभ्यास व्यक्ति को शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्थिरता और आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने में सहायक हो सकता है।
उन्होंने योग की वैज्ञानिक उपयोगिता पर चर्चा करते हुए कहा कि तनाव प्रबंधन, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन को बेहतर बनाने में योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विशेष रूप से युवाओं के संदर्भ में उन्होंने कहा कि योग मन को शांत करने और उसकी चंचलता को नियंत्रित करने का प्रभावी माध्यम है। नियमित अभ्यास के जरिए व्यक्ति अपने व्यवहार, विचारों और जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में प्रयास कर सकता है।
डॉ. नागेंद्र ने स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध कथन, “प्रत्येक आत्मा संभावित रूप से दिव्य है”, का उल्लेख करते हुए कहा कि हर व्यक्ति के भीतर असीम संभावनाएं निहित हैं। आत्मानुशासन, साधना और योग के माध्यम से इन संभावनाओं को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

स्मृति चिह्न और शॉल भेंट कर किया सम्मानित
कार्यक्रम के अंत में आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. एच.आर. नागेंद्र को स्मृति चिह्न और शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रो. सुनीता मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
बीबीएयू में आयोजित इस विशेष व्याख्यान के माध्यम से योग की भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक जीवन में उसकी प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श हुआ। वक्ताओं ने योग को स्वस्थ जीवनशैली, मानसिक संतुलन, नैतिक मूल्यों और समग्र व्यक्तित्व विकास से जोड़ते हुए इसे दैनिक जीवन में अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।




