लखनऊ: संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर के साथ जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता पर कालिख पोत दी है। न्याय के लिए दो महीने तक दफ्तर-दफ्तर भटकने वाली पीड़िता की सुनवाई तब हुई, जब मामला पूरी तरह बिगड़ गया। मंगलवार रात पुलिस ने आरोपी रेजिडेंट सचिन गुप्ता के खिलाफ FIR तो दर्ज कर ली है, लेकिन इस देरी ने पुलिस और संस्थान की विशाखा कमेटी की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
इंसाफ की जगह मिला ‘इंतजार’ और ‘धमकी’
रेडियोलॉजी विभाग की पीड़िता ने 24 फरवरी को पहली बार पीजीआई कोतवाली में तहरीर दी थी। लेकिन लखनऊ पुलिस की सुस्ती का आलम देखिए कि मामला दर्ज करने में 60 दिन लग गए। इस बीच पीड़िता ने विशाखा कमेटी, महिला आयोग और वन स्टॉप सेंटर तक का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हर जगह से उसे कोरा आश्वासन ही मिला।
“जब भी मैं पुलिस चौकी जाती, आरोपी रेजिडेंट पुलिस के सामने ही मुझे धमकाता था। पुलिस कार्रवाई करने के बजाय उसे संरक्षण दे रही थी।” – पीड़िता का आरोप
तारीख-दर-तारीख: सिस्टम की नाकामी का कच्चा चिट्ठा
पीड़िता ने न्याय के लिए जो संघर्ष किया, वह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है:
24 फरवरी: पीजीआई थाने में पहली गुहार।
16 मार्च: पीजीआई की विशाखा कमेटी को शिकायत।
24 मार्च: वन स्टॉप सेंटर पहुंची पीड़िता।
30 मार्च: यूपी महिला आयोग से मदद की अपील।
05 अप्रैल: थाने में दूसरी बार लिखित शिकायत।
10 अप्रैल: विशाखा कमेटी से फिर मिन्नतें।
मंगलवार रात: भारी दबाव के बाद आखिरकार FIR दर्ज।
नशे की लत और सुसाइड की कोशिश: आरोपी सचिन की दरिंदगी
खबर की परतें और भी डरावनी हैं। आरोप है कि आरोपी सचिन ने पीड़िता के साथ न सिर्फ मारपीट की, बल्कि उसका गला दबाकर जातिसूचक गालियां भी दीं। इस मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना ने पीड़िता को तोड़कर रख दिया:
- दिसंबर 2024: अवसाद में आकर पीड़िता ने आत्महत्या का प्रयास किया, सहकर्मियों ने जैसे-तैसे जान बचाई।
- नशे की दलदल: लगातार मिल रही धमकियों और न्याय न मिलने की वजह से पीड़िता धीरे-धीरे नशे की आदी हो गई।
बड़ा सवाल: क्या विशाखा कमेटी सिर्फ नाम की है?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी विशाखा कमेटी का काम महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षा देना है। लेकिन पीड़िता का आरोप है कि कमेटी ने कार्रवाई करने के बजाय सिर्फ तारीखें दीं और उसे मानसिक रूप से और कमजोर किया।
अब देखना यह है कि FIR दर्ज होने के बाद क्या लखनऊ पुलिस आरोपी रेजिडेंट सचिन को सलाखों के पीछे भेजेगी या रसूख के आगे एक बार फिर ‘न्याय’ घुटने टेक देगा?




