गांव की चौपाल पर जब कोई बात धीरे से कही जाती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि बात छोटी है। कई बार आदमी कैमरे के सामने बोलने से डरता है, लेकिन चूल्हे के पास बैठकर पूरी कहानी सुना देता है। पुलिस महकमे में भी कुछ आवाजें ऐसी ही हैं—ऑफ कैमरा।
कैमरे के सामने सब कुछ अनुशासित और व्यवस्थित नजर आता है। साहब का सम्मान, विभाग की मर्यादा और वर्दी का अनुशासन अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। लेकिन कैमरा बंद होने के बाद कुछ सिपाही और दीवान अपनी अलग कहानी सुनाते हैं। कोई ड्यूटी के असमान बोझ की बात करता है, कोई छुट्टी को लेकर परेशान है, कोई व्यवहार की शिकायत करता है और कोई कहता है कि ऊपर से आया आदेश सवाल से परे माना जाता है।
यहां एक बात स्पष्ट समझना जरूरी है—अधिकारी का अधिकार गलत नहीं है। पुलिस व्यवस्था बिना अनुशासन के चल ही नहीं सकती। वरिष्ठ अधिकारी को ड्यूटी लगाने, काम लेने, गलती पर जवाब मांगने और नियमों के मुताबिक कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। लेकिन गांव की भाषा में कहें तो हल चलाने का अधिकार खेत मालिक का हो सकता है, मगर बैल को लगातार मारते रहना खेती का नियम नहीं हो सकता। यही फर्क समझने की जरूरत है।
सिपाही ड्यूटी में गलती करता है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जब प्रशासनिक सख्ती और व्यक्तिगत व्यवहार के बीच की सीमा धुंधली होने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। अनुशासन और दबाव के बीच भी एक महीन लकीर होती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिसके हाथ में डंडा है, उसकी शिकायत कौन सुनेगा?
थाने या पुलिस लाइन में कोई छोटा कर्मचारी अपने ही अधिकारी के खिलाफ शिकायत करने से पहले कई बार सोचता है। उसके मन में डर रहता है कि शिकायत के बाद कहीं ड्यूटी और मुश्किल न हो जाए, छुट्टी प्रभावित न हो जाए या उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल कार्रवाई न शुरू हो जाए। शायद यही वजह है कि बहुत-सी बातें कागज तक पहुंचने से पहले ही दब जाती हैं। वे चाय की दुकान, गांव के घर, साथी पुलिसकर्मियों की बातचीत या पत्रकार के कैमरे से दूर कही गई बातों तक सीमित रह जाती हैं।
लेकिन इन ऑफ कैमरा शिकायतों को न तो तुरंत सच मान लेना चाहिए और न ही सिर्फ इसलिए खारिज कर देना चाहिए कि शिकायत करने वाला छोटा कर्मचारी है। सच्चाई तक पहुंचने का रास्ता भावनाओं से नहीं, तथ्यों और रिकॉर्ड से होकर जाता है।
किस दिन किसकी ड्यूटी लगी? किसे कितनी छुट्टी मिली? किस कर्मचारी के खिलाफ कितनी बार कार्रवाई हुई? किस आदेश का पालन कराया गया? क्या समान परिस्थितियों में सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण—शिकायत के बाद शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई प्रतिकूल कार्रवाई तो नहीं हुई? ऐसे सवालों के जवाब व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।
पुलिस विभाग में साहब की कुर्सी जरूरी है, लेकिन उस कुर्सी के सामने खड़ा सिपाही भी उसी व्यवस्था का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह केवल आदेश सुनने वाला कर्मचारी नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की पहली पंक्ति में खड़ा व्यक्ति है।
गांव के बुजुर्ग कहा करते हैं—बैल को रोज हांकना पड़ता है, मगर हांकते-हांकते उसकी पीठ नहीं तोड़ी जाती। पुलिस व्यवस्था में भी अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि नीचे की आवाज ऊपर तक पहुंचने का रास्ता ही खो दे।
इसलिए सवाल किसी एक अधिकारी, एक थाने या एक सिपाही का नहीं है। सवाल पूरी व्यवस्था का है। क्या पुलिस विभाग में ऐसा सुरक्षित और निष्पक्ष रास्ता मौजूद है, जहां कोई सिपाही बिना डर अपनी बात कह सके? अगर जवाब हां है, तो ऑफ कैमरा शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अगर जवाब नहीं है, तो कैमरे के सामने दिखाई देने वाली तस्वीर अधूरी है।
वर्दी की चमक बाहर से दिखाई देती है। लेकिन उस वर्दी के अंदर खड़ा इंसान कितना दबाव झेल रहा है, यह जानने के लिए कभी-कभी कैमरा बंद करना पड़ता है।
और शायद यहीं से असली कहानी शुरू होती है।




