लखनऊ, 13 अक्टूबर 2026। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (BBAU), लखनऊ में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से मंगलवार को मनोविज्ञान विभाग की ओर से पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। ‘सुने गए जीवन के अनुभव: वास्तविक आवाज़, वास्तविक बदलाव’ (Lived Experience Heard: Real Voice, Real Change) विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में आत्मचिंतन, भावनात्मक संतुलन, तनाव प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना स्वस्थ एवं सार्थक जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है, जितना शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। मुख्य अतिथि एवं वक्ता के रूप में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के मनोचिकित्सा विभाग के डॉ. विवेक अग्रवाल उपस्थित रहे। इस अवसर पर डीन ऑफ एकेडमिक अफेयर्स प्रो. एस. विक्टर बाबू, स्कूल ऑफ योगा, नैचुरोपैथी एंड कॉग्निटिव स्टडीज के संकायाध्यक्ष प्रो. पी.एस. रजनीकांत, कार्यक्रम संयोजक डॉ. नवीन जी. एच., मधुरिमा प्रधान और डॉ. नगमा जावेद भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करके किया गया। इसके बाद विश्वविद्यालय के कुलगीत का गायन हुआ। आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथि एवं शिक्षकों को पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न और शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रारंभ में प्रो. पी.एस. रजनीकांत ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य एवं रूपरेखा की जानकारी दी।
आत्मचिंतन और आत्मबोध से बेहतर हो सकता है मानसिक स्वास्थ्य: कुलपति
कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने अपने संबोधन में कहा कि स्वस्थ एवं संतुलित जीवन के लिए व्यक्ति का आत्मचिंतन और आत्मबोध करना बेहद जरूरी है। जब व्यक्ति अपनी भावनाओं, विचारों, क्षमताओं और सीमाओं को समझने का प्रयास करता है, तो उसे अपनी समस्याओं को बेहतर ढंग से पहचानने और उनके समाधान खोजने में सहायता मिलती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सामाजिक अपेक्षाओं, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और दूसरों से स्वयं की तुलना करने की प्रवृत्ति के कारण विशेष रूप से युवा तनाव और चिंता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में अपनी भावनाओं को समझना, स्वयं को शांत रखना और जीवन में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
प्रो. मित्तल ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना शारीरिक स्वास्थ्य की देखभाल जितना ही आवश्यक है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में बेहतर संतुलन स्थापित कर सकता है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में वर्णित पंचकोश की अवधारणा का उल्लेख करते हुए अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश के माध्यम से शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आंतरिक आनंद के विभिन्न आयामों को समझाया। उन्होंने परिवार, शैक्षणिक संस्थानों और समाज से ऐसा सहयोगात्मक वातावरण विकसित करने का आह्वान किया, जहां युवा बिना झिझक अपनी समस्याएं साझा कर सकें और उन्हें उचित सहयोग मिल सके।

मानसिक स्वास्थ्य केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं: डॉ. विवेक अग्रवाल
मुख्य अतिथि डॉ. विवेक अग्रवाल ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य का संबंध केवल मानसिक बीमारियों की अनुपस्थिति से नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के विचारों, भावनाओं, व्यवहार, रिश्तों और निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित करता है।
उन्होंने कहा कि पढ़ाई, करियर, सामाजिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत चुनौतियों के कारण युवा अनेक प्रकार के मानसिक एवं भावनात्मक दबावों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने और जरूरत के समय सहयोग उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
डॉ. अग्रवाल ने मरीजों के उपचार में मानसिक और भावनात्मक आवश्यकताओं को समझने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि उपचार के दौरान शारीरिक समस्याओं के साथ मरीज की भावनात्मक स्थिति को समझना भी महत्वपूर्ण है। संवेदनशील संवाद और भावनात्मक संबल मरीजों को सहयोग देने में अहम भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने एडवर्स चाइल्डहुड एक्सपीरियंस (बचपन के प्रतिकूल अनुभवों) के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि बचपन में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने का प्रभाव व्यक्ति के मानसिक एवं भावनात्मक विकास पर लंबे समय तक रह सकता है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लेकर व्याप्त झिझक और भेदभाव दूर करने तथा जरूरतमंद लोगों को समय पर सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया।

सहानुभूति और संवेदनशील संवाद को बताया महत्वपूर्ण
डीन ऑफ एकेडमिक अफेयर्स प्रो. एस. विक्टर बाबू ने मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सहानुभूति और संवेदनशीलता के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दूसरों की परिस्थितियों, भावनाओं और मानसिक स्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे लोगों की बात धैर्यपूर्वक सुनना, उनके प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना और उन्हें भावनात्मक सहयोग देना आवश्यक है। समाज में ऐसा सकारात्मक एवं सहयोगात्मक वातावरण विकसित किया जाना चाहिए, जहां लोग बिना किसी संकोच या भेदभाव के अपनी समस्याएं साझा कर सकें।
पोस्टर और नुक्कड़ नाटक से दिया मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता का संदेश
कार्यक्रम के अंतर्गत मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए पोस्टर मेकिंग और नुक्कड़ नाटक प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया गया। प्रतिभागियों ने अपनी रचनात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य के महत्व, इससे जुड़ी चुनौतियों तथा जागरूकता और सहयोग की आवश्यकता को सामने रखा।
पोस्टर प्रतियोगिता में जूलॉजी विभाग की रोशिता ने प्रथम पुरस्कार हासिल किया। लाइफ साइंस विभाग के ओम सिंह को द्वितीय और अखिल राज को तृतीय पुरस्कार मिला, जबकि आयुषी मिश्रा को सांत्वना पुरस्कार प्रदान किया गया।
नुक्कड़ नाटक प्रतियोगिता में निकिता आर्या, हर्षिता सिंह, पायल मीणा, आजाद सिंह और अभिनव नायर को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

प्रश्नोत्तर सत्र में तनाव और भावनात्मक संतुलन पर चर्चा
कार्यक्रम के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन, चिंता और भावनात्मक संतुलन से जुड़े विषयों पर प्रश्न पूछे। इस सत्र के माध्यम से प्रतिभागियों को मानसिक स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं को समझने और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करने का अवसर मिला।
अंत में कार्यक्रम संयोजक डॉ. नवीन जी. एच. ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और अन्य प्रतिभागी उपस्थित रहे।
विश्वविद्यालय में आयोजित इस पैनल चर्चा के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, आत्मचिंतन, संवेदनशील संवाद और सामाजिक सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।




