लखनऊ। राजधानी के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) में महिला रेजिडेंट डॉक्टर के उत्पीड़न का मामला अब और गंभीर होता जा रहा है। लगभग दो महीने की जद्दोजहद के बाद दर्ज हुई FIR के बावजूद आरोपी रेजिडेंट डॉक्टर सचिन गुप्ता अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर है। पीड़िता का आरोप है कि पुलिस केवल आश्वासन दे रही है, जबकि आरोपी लगातार कानून से बचने की कोशिश कर रहा है।
पीड़िता ने सवाल उठाया है कि आखिर इतने संवेदनशील मामले में भी आरोपी को गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा सका? क्या पुलिस की कार्यशैली लापरवाही का उदाहरण है या फिर कहीं न कहीं आरोपी को बचाने की कोशिश हो रही है?
पीड़िता के अनुसार, उसकी FIR 21 अप्रैल 2026 की रात 11:08 बजे दर्ज की गई थी। उसी दिन उसने आरोपी सचिन गुप्ता को आखिरी बार SGPGI परिसर में देखा था। इसके बाद से आरोपी न तो विभाग में दिखाई दिया और न ही कैंपस में। पीड़िता का कहना है कि FIR दर्ज होते ही आरोपी अचानक गायब हो गया, लेकिन पुलिस उसे तलाशने में नाकाम रही।
पीड़िता को 24 अप्रैल को मेडिकल परीक्षण के लिए झलकारी बाई अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद 4 मई को मजिस्ट्रेट के समक्ष उसका बयान दर्ज कराया गया। लेकिन तब तक भी पुलिस आरोपी तक नहीं पहुंच सकी थी।
मामले में नया मोड़ तब आया जब आरोपी सचिन गुप्ता ने FIR निरस्त कराने के लिए 7 मई को हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। 11 मई को पहली सुनवाई लगी, लेकिन केस का नंबर नहीं आ सका। इसके बाद 13 मई और फिर 15 मई को भी सुनवाई टलती रही। बताया जा रहा है कि 15 मई को मजिस्ट्रेट का बयान समय से हाईकोर्ट नहीं पहुंच पाने के कारण मामला पासओवर हो गया। आखिरकार 19 मई को हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी।
पीड़िता का आरोप है कि कानूनी प्रक्रिया में देरी और आरोपी की सक्रिय रणनीति के चलते उसे लगातार मानसिक दबाव झेलना पड़ा। उसका कहना है कि आरोपी कानून से बचने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा था, जबकि पुलिस सिर्फ औपचारिकताएं पूरी करती नजर आई।
पीड़िता ने बताया कि 16 मई को उसने DCP महिला अपराध ममता रानी चौधरी से मुलाकात की थी। उन्होंने आरोपी की गिरफ्तारी के लिए सहयोग का आश्वासन दिया। इसी दिन ACP गोसाईगंज ऋषभ यादव से भी मुलाकात हुई, जहां विशेष टीम गठित कर आरोपी की तलाश करने की बात कही गई।
इसके बावजूद पुलिस को अब तक आरोपी का कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया है। हालांकि सूत्रों के अनुसार, हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के अगले दिन आरोपी की कार की लोकेशन डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) परिसर में मिली थी। इसके बाद भी गिरफ्तारी न होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
पीड़िता का आरोप है कि यदि पुलिस शुरुआत से गंभीरता दिखाती, तो आरोपी आसानी से पकड़ा जा सकता था। उनका कहना है कि FIR दर्ज होने के तुरंत बाद ही आरोपी गायब हो गया, लेकिन पुलिस ने समय रहते कोई सख्त कदम नहीं उठाया।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर महिला सुरक्षा, संस्थागत संवेदनशीलता और पुलिस की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। खासकर इसलिए क्योंकि मामला प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों में से एक से जुड़ा है, जहां भविष्य के डॉक्टर प्रशिक्षण लेते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर आरोपी कब तक फरार रहेगा? क्या पुलिस सचमुच उसे पकड़ने में असमर्थ है, या फिर कहीं न कहीं जांच और कार्रवाई की रफ्तार जानबूझकर धीमी रखी जा रही है?
फिलहाल पीड़िता न्याय की उम्मीद में लगातार अधिकारियों के चक्कर लगा रही है, जबकि आरोपी की गिरफ्तारी अब भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है।
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