एक जेई के कंधों पर 19 गांवों का बोझ, फिर कैसे होगी मनरेगा कार्यों की निगरानी? अधिकारियों पर कई गुना कार्यभार, ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा योजनाओं का पूरा लाभ

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मऊ- गांवों की तस्वीर बदलने और गरीबों को रोजगार देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार हर वर्ष मनरेगा, जिसे अब विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) के नाम से भी जाना जा रहा है, पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। कागजों पर तालाब खुद रहे हैं, सड़कें बन रही हैं और विकास कार्यों की लंबी सूची तैयार हो रही है। लेकिन मऊ जनपद में व्यवस्था की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मनरेगा के तहत किसी भी ग्राम पंचायत में होने वाले निर्माण कार्यों की जिम्मेदारी ग्राम रोजगार सेवक, ग्राम सचिव और जूनियर इंजीनियर (जेई) पर होती है। मगर जिले में कर्मचारियों की भारी कमी के कारण पूरी व्यवस्था लड़खड़ाती नजर आ रही है। जानकारी के अनुसार, एक ग्राम सचिव के जिम्मे 7 से 13 ग्राम पंचायतों का कार्यभार है, जबकि एक जूनियर इंजीनियर को 12 से लेकर 19 ग्राम पंचायतों तक के निर्माण कार्यों की तकनीकी निगरानी करनी पड़ रही है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर एक अधिकारी रोजाना इतने गांवों में पहुंचकर निर्माण कार्यों का निरीक्षण कैसे करेगा? गुणवत्ता की जांच कब होगी और अनियमितताओं पर नजर कौन रखेगा? ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारियों की कमी का सीधा असर विकास कार्यों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। कई बार निर्माण कार्यों का निरीक्षण समय से नहीं हो पाता, जिससे शिकायतों के बावजूद सुधार में देरी होती है। यदि किसी अधिकारी के जिम्मे एक-दो नहीं बल्कि 19 गांव हों, तो हर कार्यस्थल तक नियमित पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है। जानकार मानते है कि मनरेगा जैसी बड़ी योजना को सफल बनाने के लिए पर्याप्त तकनीकी और प्रशासनिक अमला होना जरूरी है। खाली पदों के कारण जहां एक ओर मौजूदा कर्मचारी अत्यधिक दबाव में काम कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षित युवा रोजगार के अवसरों से वंचित हैं। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि रिक्त पदों पर नियुक्तियां कब होंगी? यदि सचिवों और जूनियर इंजीनियरों की पर्याप्त तैनाती की जाए, तो न केवल योजनाओं की निगरानी मजबूत होगी, बल्कि ग्रामीण युवाओं को भी रोजगार मिलेगा और विकास कार्यों की गुणवत्ता में सुधार आएगा। आखिर गांवों का विकास केवल कागजी फाइलों से नहीं, बल्कि अधिकारियों की सक्रिय मौजूदगी, नियमित निगरानी और जवाबदेही से ही संभव है। यदि सरकार वास्तव में ग्रामीण भारत को मजबूत बनाना चाहती है, तो उसे जल्द से जल्द रिक्त पदों को भरने, निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करने और व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। तभी मनरेगा अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा कर सकेगी।


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