2017 में मथुरा में अपनी पत्नी और दो बेटों की हत्या में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में, अभियोजन पक्ष को एक उचित और ठोस मकसद स्थापित करना चाहिए, यह देखते हुए कि किसी मजबूत मकसद के अभाव में किसी आरोपी को दोषी ठहराना असुरक्षित होगा।

न्यायमूर्ति जे जे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने बाबू द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया और निर्देश दिया कि उसे तुरंत जेल से रिहा किया जाए। मामले के तथ्यों के अनुसार, 3 सितंबर, 2017 को अपीलकर्ता की चाची ने एक प्राथमिकी दर्ज कराई थी कि सुबह जब वह अपीलकर्ता के घर गई, तो उसने अपीलकर्ता की पत्नी और उनके दो बेटों के शव देखे। तीनों की हत्या किसी नुकीली चीज से की गई थी. अपीलकर्ता को उसी दिन दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया गया।
27 जनवरी 2022 को मथुरा की ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई. वर्तमान अपील सजा के खिलाफ दायर की गई थी। हालाँकि पुलिस द्वारा यह दावा किया गया था कि हत्या का हथियार अपीलकर्ता द्वारा प्रदान की गई जानकारी पर बरामद किया गया था, इसे एक खुली भूमि से बरामद किया गया था और इस बात की गवाही देने वाला कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था कि अपीलकर्ता ने पुलिस को उस स्थान के बारे में सूचित किया था जहाँ उसने हथियार रखा था।
अदालत ने 13 जुलाई के अपने आदेश में कहा, “इसलिए, हमारी सुविचारित राय में, अपीलकर्ता की निशानदेही पर हत्या के हथियार की बरामदगी की इस आपत्तिजनक परिस्थिति को खारिज किया जाना चाहिए।”
अदालत ने तब कहा, “यहाँ, अभियोजन पक्ष द्वारा जो गवाही पेश की गई है, उसमें अपीलकर्ता को इतना भयानक अपराध करने के लिए कोई मकसद नहीं बताया गया है। धारा 161 सीआरपीसी के तहत पुलिस द्वारा दर्ज किए गए अपीलकर्ता के बयान में एक मकसद का कुछ उल्लेख है, लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में इसका कोई सबूत पेश नहीं किया जा सका।”
“वर्तमान मामले की तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामले में कुछ उचित और शक्तिशाली मकसद की अनुपस्थिति में, अपीलकर्ता को दोषी ठहराना असुरक्षित होगा। हम अच्छी तरह से स्थापित सिद्धांत से अवगत हैं कि अकेले मकसद की अनुपस्थिति पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर अभियोजन को खारिज करने का आधार नहीं होगी, जहां यह उचित संदेह से परे अपराध स्थापित करता है, लेकिन ऐसे मामले में जहां परिस्थितियां अन्यथा मामले को स्थापित नहीं करती हैं, मकसद की अनुपस्थिति, जैसा कि वर्तमान मामले में है, निश्चित रूप से अपीलकर्ता के पक्ष में होगी।” अदालत ने देखा.




