इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एफआईआर पंजीकरण में कथित खामियों को गंभीरता से लिया है और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), उत्तर प्रदेश, प्रमुख सचिव (गृह) और एसएसपी, बरेली को विसंगतियों को स्पष्ट करने और सुधारात्मक उपाय सुनिश्चित करने के लिए रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

सूचक ने आरोपी पर शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया। हालाँकि, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498-ए (एक विवाहित महिला के प्रति पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने डीजीपी और प्रमुख सचिव (गृह) को पुलिस अधिकारियों को संवेदनशील बनाने के लिए एक तंत्र विकसित करने का भी निर्देश दिया। इसके अलावा, अदालत ने एसएसपी, बरेली को दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और चूक का स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया।
अदालत ने 17 मार्च के अपने आदेश में निर्देश दिया कि मामले को अनुपालन रिपोर्ट के साथ आगे की सुनवाई के लिए 27 अप्रैल से शुरू होने वाले सप्ताह में सूचीबद्ध किया जाए।
याचिकाकर्ता शिवम सिंह ने आईपीसी की धारा 498-ए और 506 के तहत अपराध संख्या 354/2023 से उत्पन्न मामले संख्या 156/2025 में न्यायिक मजिस्ट्रेट, बरेली द्वारा पारित 17 अप्रैल, 2024 के आरोप पत्र और 15 जनवरी, 2025 के संज्ञान आदेश को रद्द करने की मांग की थी।
अदालती कार्यवाही के दौरान, शिवम सिंह के वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर में आईपीसी की धारा 498-ए या 506 के तहत किसी भी अपराध का खुलासा नहीं किया गया है और दोनों पक्षों के बीच कोई वैध विवाह मौजूद नहीं है, जिससे आरोप अस्पष्ट हो गए हैं। हालाँकि, राज्य ने तर्क दिया कि आवेदक ने शादी और सरकारी रोजगार के झूठे वादे पर शिकायतकर्ता के साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया था।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, अदालत ने पाया कि एफआईआर और पीड़िता के बयान से प्रथम दृष्टया बलात्कार के आरोपों का संकेत मिलता है, फिर भी ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया गया, इसे एक गंभीर चूक करार दिया। इसने लिखित शिकायत और एफआईआर के बीच भौतिक विसंगतियों को भी नोट किया, यह देखते हुए कि शिकायत में बलात्कार का खुलासा हुआ, एफआईआर इसे प्रतिबिंबित करने में विफल रही, जिससे जांच की निष्पक्षता और शुद्धता पर संदेह पैदा हो गया।
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