मखाने की खेती पर किसानों को मिला आधुनिक खेती का प्रशिक्षण, बिहार की तर्ज पर मखाने की खेती को मिलेगा बढ़ावा

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मऊ- गांव-देहात में कहा जाता है कि “मेहनत का फल मीठा होता है” और किसान यदि परंपरागत खेती के साथ नई फसलों को अपनाए तो आमदनी के रास्ते भी बढ़ सकते हैं। इसी सोच को धरातल पर उतारने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केंद्र, पिलखी में मखाने की खेती को बढ़ावा देने के लिए दो दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में जनपद के विभिन्न विकासखंडों से पहुंचे पच्चीस किसानों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिला उद्यान अधिकारी राम सिंह, उप कृषि निदेशक, कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार सिंह सहित उद्यान वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र कुमार कुशवाहा, डॉ. सुमित कुमार गुप्ता, डॉ. प्रशांत देव, डॉ. आकांक्षा, डॉ. अंगद प्रसाद, डॉ. हिमांशु राय तथा सेवानिवृत्त सहायक निदेशक मत्स्य डॉ. डी.ए. पांडेय मौजूद रहे। वैज्ञानिकों ने किसानों को मखाने की आधुनिक खेती की बारीकियों से अवगत कराया। खेत की तैयारी, जैविक खेती, कीट एवं रोग प्रबंधन, उत्पादन तकनीक तथा मखाने की खेती से होने वाले आर्थिक लाभ पर विस्तार से जानकारी दी गई। किसानों को बताया गया कि बदलते समय में “एक ही खेत में एक ही आस” रखने के बजाय नई और लाभकारी फसलों की ओर कदम बढ़ाना आय बढ़ाने का बेहतर माध्यम बन सकता है। डॉ. आकांक्षा ने बताया कि पड़ोसी राज्य बिहार में मखाने का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। वहां किसानों ने मखाने की खेती को अपनाकर इसे आय का महत्वपूर्ण जरिया बनाया है। जनपद में भी उपयुक्त क्षेत्रों में मखाने की खेती को बढ़ावा देकर किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सकती है। जिला उद्यान अधिकारी राम सिंह ने किसानों को मखाने की खेती के लिए शासन की ओर से दिए जाने वाले अनुदान एवं अन्य सुविधाओं की जानकारी दी। उन्होंने किसानों से योजनाओं का लाभ उठाकर नई फसल को अपनाने का आह्वान किया। हालांकि किसानों के सामने मखाने की खेती की राह इतनी आसान भी नहीं है, अगर उत्पादन अच्छा हुआ तो मखाना बिकेगा कहां? यदि स्थानीय बाजार में मखाने की खपत कम रही तो तैयार उपज का खरीदार कौन होगा? ऐसे में केवल खेती का प्रशिक्षण काफी नहीं होगा, बल्कि किसानों को बाजार से जोड़ने, प्रसंस्करण इकाइयां विकसित करने और उत्पाद की बिक्री की ठोस व्यवस्था पर भी काम करना होगा।

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