गाँव में एक कहावत है—“घर का आदमी घर में ही पराया हो जाए, तो समझो चौखट कुछ ज्यादा ही ऊँची कर दी गई है।” आज भाषा और रोजगार को लेकर उठ रहे सवालों पर यह कहावत कुछ-कुछ सटीक बैठती है। भारत की पहचान ही उसकी विविधता है। कहीं मराठी की मिठास है, कहीं भोजपुरी की ठसक, कहीं तमिल की गरिमा, कहीं कन्नड़ की लय, तो कहीं बंगाली और पंजाबी की अपनी अलग रवानी। भाषाएँ अलग हैं, बोलियाँ अलग हैं, पहनावा और खान-पान अलग हैं, लेकिन देश एक है। यही विविधता भारत की ताकत है।महाराष्ट्र में दूसरे राज्यों से आने वाले ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा के ज्ञान को अनिवार्य करने और नियमों का पालन न करने पर लाइसेंस या परमिट निरस्तीकरण कार्रवाई की व्यवस्था ने इसी बहस को जन्म दिया है। भाषा सीखना कोई बुरी बात नहीं है। जिस खेत में रहो, उसकी मिट्टी को पहचानना अच्छी बात है। महाराष्ट्र में रहने वाला व्यक्ति मराठी सीखे, वहाँ की संस्कृति समझे और स्थानीय लोगों से उनकी भाषा में संवाद करे—इससे अपनापन ही बढ़ेगा। लेकिन सवाल तब पैदा होता है, जब भाषा सम्मान और संवाद का माध्यम न रहकर रोजगार की चौखट पर खड़ा पहरेदार बन जाए। आज एक राज्य कहे कि यहाँ काम करना है तो हमारी भाषा सीखो। कल दूसरा राज्य कह सकता है कि पहले हमारी भाषा की परीक्षा पास करो। फिर तीसरा राज्य अपना प्रमाणपत्र मांग सकता है। व्यंग्य में कहें तो फिर भारत सरकार को एक काम और कर देना चाहिए। हर राज्य के लिए अलग-अलग पासपोर्ट जारी कर दीजिए! महाराष्ट्र जाना है तो मराठी पासपोर्ट, तमिलनाडु जाना है तो तमिल पासपोर्ट, कर्नाटक जाना है तो कन्नड़ प्रमाणपत्र और उत्तर प्रदेश आने के लिए हिंदी या भोजपुरी की परीक्षा! सुनने में यह मजाक लगता है, लेकिन गाँव में कहा जाता है—“बूँद-बूँद से घड़ा भरता है।” छोटे-छोटे प्रतिबंध अगर लगातार बढ़ते जाएँ तो एक दिन बड़ी दीवार खड़ी हो सकती है। रोजगार की तलाश में मुंबई आने वाला बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड या राजस्थान का मजदूर किसी की भाषा और संस्कृति को चुनौती देने नहीं आता। उसके पास दो हाथ होते हैं, मेहनत करने का हौसला होता है और घर पर बैठे परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी होती है। पेट की आग भाषा देखकर नहीं जलती। भारत का संविधान नागरिकों को देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने और काम करने की स्वतंत्रता देता है। यदि महाराष्ट्र का नागरिक रोजगार के लिए दिल्ली, गुजरात या उत्तर प्रदेश जा सकता है, तो दूसरे राज्यों का नागरिक भी मुंबई में मेहनत करने का अधिकार रखता है। स्थानीय भाषा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन सम्मान और अनिवार्यता के बीच का फर्क भी समझना होगा। भाषा दिल जोड़ने का पुल बने, रोजगार रोकने की दीवार नहीं। मराठी हमारी है, तमिल हमारी है, कन्नड़ हमारी है, भोजपुरी हमारी है और बंगाली भी हमारी है। अलग-अलग भाषाएँ भारत को बाँटती नहीं, बल्कि भारत की आवाज को और समृद्ध करती हैं। गाँव की भाषा में कहें तो—“मेड़ भले अलग-अलग हों, खेत की मिट्टी एक ही रहती है।” भारत भी वही मिट्टी है। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किस भाषा का है; सवाल यह होना चाहिए कि कौन इस देश का नागरिक है। कहीं ऐसा न हो कि कल देश के भीतर ही कोई मजदूर गठरी उठाकर पूछे— “बाबूजी, यह भारत की सीमा है या विदेश का बॉर्डर?”और जवाब मिले—“पहले भाषा का पासपोर्ट दिखाओ!” ऐसा भारत हम नहीं चाहते। भाषा हमारी पहचान बने, दीवार नहीं; राज्य हमारी संस्कृति हों, सीमा नहीं।
भाषा की दीवार या भारत की एकता ? सवाल महाराष्ट्र से आगे का है !



