भारतीय भाषाओं को ज्ञान, शोध और शिक्षा की सशक्त भाषा बनाने पर जोर, बीबीएयू में कार्यशाला का समापन

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भारतीय भाषा पुस्तक योजना के राज्य स्तरीय क्रियान्वयन पर विशेषज्ञों ने साझा किए विचार, गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों के लेखन और डिजिटल प्रसार पर दिया जोर

लखनऊ, 8 सितंबर 2026। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ में भारतीय भाषाओं को शिक्षा, शोध और ज्ञान-सृजन की प्रभावी भाषा बनाने की दिशा में आयोजित द्विदिवसीय कार्यशाला का मंगलवार को समापन हुआ। विश्वविद्यालय एवं भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला का विषय ‘भारतीय भाषा पुस्तक योजना के राज्य स्तरीय क्रियान्वयन हेतु’ था।

कार्यक्रम का आयोजन बीबीएयू के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल के दिशानिर्देशन एवं संरक्षण में किया गया। समापन सत्र में काशी विद्यापीठ, वाराणसी के प्रो. नरेंद्र नारायण, दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर की प्रो. सुषमा पाण्डेय, भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रो. शैलेश मिश्रा, जवाहर लाल नेहरू स्मारक पीजी कॉलेज, महाराजगंज के प्रधानाचार्य डॉ. अजय मिश्रा तथा कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव मौजूद रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. उदयन मिश्र द्वारा अतिथियों एवं प्रतिभागियों के स्वागत से हुई। उन्होंने कार्यशाला के उद्देश्य और रूपरेखा की जानकारी दी।

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भाषा सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान विकास का आधार : प्रो. नरेंद्र नारायण

काशी विद्यापीठ, वाराणसी के प्रो. नरेंद्र नारायण ने अपने संबोधन में भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध पंक्तियों— ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’—का उल्लेख करते हुए भारतीय भाषाओं के महत्व को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान, ज्ञान-विकास और सामाजिक चेतना में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रो. नारायण ने दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार और अध्ययन-अध्यापन के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा करते हुए हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता पर प्रकाश डाला।

उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, भारतेन्दु हरिश्चंद्र और मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन रचनाकारों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के साथ सामाजिक जागरूकता, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों को भी मजबूत किया।

उन्होंने कहा कि हिंदी को केवल साहित्य और संवाद की भाषा तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे शिक्षा, शोध और ज्ञान-सृजन की सशक्त भाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर

भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने कहा कि कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भारतीय इतिहास, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर पुनः लौटना तथा इस दिशा में गंभीरता से कार्य करना है।

उन्होंने कहा कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा में शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, गणित, दर्शन, कला और जीवन मूल्यों से संबंधित व्यापक ज्ञान मौजूद है। आवश्यकता है कि इस ज्ञान को भारतीय भाषाओं के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए और आधुनिक संदर्भों के अनुरूप विकसित किया जाए।

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों का निर्माण और व्यापक प्रसार भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ विद्यार्थियों को उनकी जड़ों, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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शिक्षा व्यवस्था में भारतीय भाषाओं को उचित स्थान देने की जरूरत

दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर की प्रो. सुषमा पाण्डेय ने कहा कि कोई भी देश अपनी मातृभाषा और निज भाषा के माध्यम से व्यापक एवं वास्तविक प्रगति कर सकता है। भाषा आम जनमानस से जुड़ने और ज्ञान को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम है।

उन्होंने भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा, वैदिक शिक्षा, योग और भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख किया। साथ ही वर्ष 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 तक भाषा एवं शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रावधानों और प्रयासों पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं को शिक्षा एवं ज्ञान-विमर्श में उचित स्थान देना वर्तमान समय की आवश्यकता है। साथ ही भारतीय शिक्षा व्यवस्था को भारतीय ज्ञान परंपरा, भाषाओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया।

डिजिटल माध्यमों से भारतीय भाषाओं को मिलेगा व्यापक विस्तार

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रो. शैलेश मिश्रा ने भारतीय भाषाओं के विकास में डिजिटल तकनीक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा कि ई-बुक्स, डिजिटल पुस्तकालय, ऑनलाइन पाठ्य सामग्री, ऑडियो-वीडियो कंटेंट और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।

उन्होंने भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण और समकालीन सामग्री के निर्माण, अनुवाद एवं डिजिटल प्रसार पर जोर दिया। उनके अनुसार तकनीक के प्रभावी इस्तेमाल से युवा वर्ग को अपनी भाषाओं में ज्ञान प्राप्त करने और उससे जुड़ने का बेहतर अवसर मिल सकता है।

शोध को समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़ने पर जोर

जवाहर लाल नेहरू स्मारक पीजी कॉलेज, महाराजगंज के प्रधानाचार्य डॉ. अजय मिश्रा ने शोध कार्यों के बदलते स्वरूप पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि शोध का उद्देश्य केवल अकादमिक उपलब्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं को समझना, उनके कारणों की पहचान करना और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना होना चाहिए।

उन्होंने शोध को जनसरोकारों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि वही शोध वास्तव में सार्थक है, जिसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके।

डॉ. मिश्रा ने हिंदी में शोध कार्यों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि हिंदी को केवल संचार की भाषा न मानकर ज्ञान, अनुसंधान और अकादमिक विमर्श की सशक्त भाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

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भारतीय भाषा पुस्तक योजना के क्रियान्वयन पर हुई समूह चर्चा

कार्यक्रम में ‘भारतीय भाषा पुस्तक योजना : एक परिचय’ विषय पर विशेष सत्र भी आयोजित किया गया। इसमें भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तकों के लेखन, प्रकाशन और प्रसार को गति देने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।

प्रतिभागियों ने राज्य स्तर पर योजना के क्रियान्वयन से संबंधित प्रारूपों और प्रक्रियाओं पर अपने विचार साझा किए। समूह गतिविधियों के माध्यम से योजना के क्रियान्वयन में संभावित चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा की गई तथा व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए गए।

कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पुस्तक प्रकाशन की संस्कृति को बढ़ावा देना और राज्यों में भारतीय भाषा पुस्तक योजना के प्रभावी एवं समन्वित क्रियान्वयन के लिए सामूहिक प्रयासों को मजबूत करना रहा।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से आए शिक्षक एवं प्रतिभागी, बीबीएयू के शिक्षक तथा गैर-शिक्षण अधिकारी मौजूद रहे।

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