मऊ- कहते हैं, “मर्ज पुराना हो तो इलाज भी पक्का होना चाहिए।” गाजर घास के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए हर वर्ष जागरूकता और उन्मूलन अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि इतने प्रयासों के बावजूद गाजर घास पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो पा रही है? इसी सवाल को केंद्र में रखते हुए भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR–NISST), मऊ द्वारा बुधवार को ग्राम बगली पिजड़ा में 21 वें गाजर घास जागरूकता सप्ताह के अंतर्गत कृषक संवेदीकरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 48 महिलाओं सहित कुल 88 किसानों ने सहभागिता की। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार ने गाजर घास से मानव स्वास्थ्य, पशुओं और फसलों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की जानकारी दी। वैज्ञानिक डॉ. अंकित ने इसके फैलाव, नुकसान तथा समेकित प्रबंधन के उपाय बताते हुए कहा कि “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता” गाजर घास के स्थायी नियंत्रण के लिए व्यक्तिगत प्रयासों के साथ पूरे गांव की सामूहिक भागीदारी जरूरी है। कार्यक्रम में यह बात भी उभरकर सामने आई कि सिर्फ साल में एक बार अभियान चलाने के बजाय गाजर घास की नियमित निगरानी और समय-समय पर सामूहिक उन्मूलन अभियान चलाना अधिक प्रभावी हो सकता है। यदि गांव के किसान, ग्राम पंचायत और संबंधित संस्थाएं मिलकर लगातार प्रयास करें तो इस खरपतवार के प्रसार पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है। कार्यक्रम के अंत में किसानों ने अपने आसपास गाजर घास हटाने तथा गांव स्तर पर सामूहिक अभियान चलाने का संकल्प लिया। पूर्व ग्राम प्रधान अच्छेलाल ने भी ग्राम सभा के माध्यम से इसके उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयास करने पर सहमति जताई। संदेश साफ है – “हर साल रस्म अदायगी नहीं, लगातार भागीदारी चाहिए; तभी गाजर घास की जड़ पर चोट होगी।”





